उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने हालिया बयान में कहा है कि ‘‘मोहब्बत की दुकान’’ चलाने का दावा करने वाले कुछ लोग असल में देश में दंगे करवाने की साजिश रच रहे हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि कुछ नेता देश को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। यह टिप्पणी राजनीतिक माहौल में नई बहस और प्रतिक्रियाओं को जन्म दे रही है।
पाठक के बयान ने उन सवालों को फिर से उभारा है जिनका संबंध सामाजिक सद्भाव, कानून व्यवस्था और राजनीतिक ज़िम्मेदारी से है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ऐसे लोगों के इरादे वोटबैंक या राजनीतिक लाभ के लिए समाज में तनाव फैलाने से किसी भी तरह पीछे नहीं हटते। उनका कहना था कि प्यार और अहिंसा का ढोंग करने वाले असल में हिंसा के लिए उकसा सकते हैं, इसलिए चेतावनी और सतर्कता जरूरी है।
राजनीतिक टिप्पणीकार इस बयान को उत्तर प्रदेश के चुनावी और संवेधानिक परिदृश्य में देख रहे हैं। ऐसे आरोपों का असर सिर्फ आरोपित दलों तक सीमित नहीं रहता; यह आम जनता के विश्वास, सांप्रदायिक माहौल और मीडिया कवरेज पर भी असर डालता है। फिलहाल कांग्रेस की ओर से इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया प्रतीक्षित है, जबकि सामाजिक मीडिया पर इस विषय पर तीव्र बहस चल रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में गंभीर आरोपों के लिए ठोस सबूत और जांच आवश्यक है। राजनीतिक संवाद में जवाबदेही और तटस्थ जांच से ही भरोसा कायम किया जा सकता है। समुदायों को भड़काने वाले बयानों से बचना चाहिए और नेतृत्व को शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी लेने की जरूरत है।
निष्कर्षतः, बृजेश पाठक का बयान राजनीतिक अनुशासन और सार्वजनिक संवाद की दिशा पर सवाल उठा रहा है। सही और पारदर्शी प्रक्रिया के जरिए स्थिति का निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए ताकि राजनीति व्यक्तिगत हमलों से आगे निकल कर मुद्दों और नीतियों पर केंद्रित रहे।

